नया कानून मनरेगा को निरस्त करने का प्रयास : नरेगा संघर्ष मोर्चा 

नरेगा संघर्ष मोर्चा ने आरोप लगाया है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम की जगह प्रस्तावित नया कानून काम के अधिकार का नरसंहार है और यह मनरेगा को निरस्त करने का प्रयास है।

उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार मनरेगा को समाप्त कर मनरेगा की जगह एक नया कानून लाने की तैयारी कर रही है और इससे संबंधित बिल को लोकसभा में पेश करने की तैयारी में है। केंद्र ने इस नए विधेयक का नाम “विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)” दिया है।

केंद्र सरकार के अनुसार, नए बिल का उद्देश्य विकसित भारत 2047 के विजन को पूरा करना है। दावा किया गया है कि “मनरेगा योजना” के तहत ग्रामीण क्षेत्र में अकुशल मजदूर परिवारों को 100 दिनों के काम की गारंटी को बढ़ाकर नए कानून में 125 दिन करने का प्रस्ताव करता है। 

इस विधेयक को लेकर देश में मजदूर संगठनों के बीच असंतोष देखा जा रहा है और इसे लेकर विरोध शुरू हो चुका है।

नरेगा संघर्ष मोर्चा के अनुसार मज़दूरों और मज़दूर संगठनों से किसी भी प्रकार के परामर्श के बिना प्रस्तुत यह विधेयक, एक अधिकार-आधारित क़ानून से जो प्रवर्तनीय अधिकार प्रदान करता है, एक ऐसे बजट-सीमित कार्यक्रम की ओर मूलभूत बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें केंद्र सरकार की कोई जवाबदेही नहीं है।

नरेगा संघर्ष मोर्चा का कहना है मनरेगा काम का एक वैधानिक अधिकार स्थापित करता है, जो मांग-आधारित और सार्वभौमिक है, अर्थात किसी भी ग्रामीण क्षेत्र में कोई भी वयस्क व्यक्ति जो अकुशल शारीरिक श्रम करने को इच्छुक हो, उसे काम उपलब्ध कराया जाता है।

लेकिन वीबी जी आरएएम जी विधेयक के अंतर्गत, धारा 5(1) में कहा गया है कि “राज्य सरकार, राज्य के ऐसे ग्रामीण क्षेत्रों में, जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किया गया हो, उन प्रत्येक परिवार को, जिनके वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक कार्य करने के लिए स्वेच्छा से आगे आते हैं, कम से कम 125 दिनों का गारंटीकृत रोज़गार प्रदान करेगी।” 

मतलब साफ है कि ऐसे में यदि किसी ग्रामीण क्षेत्र को केंद्र द्वारा अधिसूचित नहीं किया जाता है, तो उस क्षेत्र के लोगों के लिए काम का कोई अधिकार नहीं होगा, जिससे सार्वभौमिक रूप से गारंटीकृत रोज़गार वस्तुतः केंद्र सरकार की कृपा पर चलने वाली किसी अन्य योजना में सिमट जाएगा।

बता दें कि मनरेगा की ताकत इसकी मांग आधारित प्रकृति से आती है, यानी हर ग्रामीण मज़दूर को 15 दिनों के भीतर काम दिया जाना अनिवार्य है। और ऐसा न होने पर वह बेरोज़गारी भत्ते का हकदार होता है। मज़दूरी की 100% राशि का भुगतान केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है।

लेकिन प्रस्तावित कानून के विधेयक की धारा 4(5) में कहा गया है कि “केंद्र सरकार प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए राज्य-वार मानक आवंटन का निर्धारण करेगी, जो केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किए जाने वाले वस्तुनिष्ठ मानकों पर आधारित होगा।”

वहीं धारा 4(6) में आगे कहा गया है कि “यदि कोई राज्य अपने मानक आवंटन से अधिक व्यय करता है, तो उस अतिरिक्त व्यय को राज्य सरकार द्वारा, केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित तरीके और प्रक्रिया के अनुसार वहन किया जाएगा।” इससे केंद्र सरकार को राज्यों को दिए जाने वाले धन की मात्रा मनमाने ढंग से तय करने का अधिकार मिल जाता है, और इसी के आधार पर यह तय होगा कि किसी राज्य में कितने दिनों का रोज़गार दिया जा सकता है। 

इस बाबत मोर्चा का कहना है कि यह मनरेगा की मूल सोच को पूरी तरह पलट देता है। मनरेगा में जहां धन आवंटन मांग के अनुसार होता था, अब उसकी जगह एक ऐसी आपूर्ति-आधारित व्यवस्था लायी जा रही है, जिसमें रोज़गार की मांग को पहले से तय बजट के अनुसार ढलना पड़ेगा।

मनरेगा के तहत मज़दूरी का 100% और सामग्री लागत का 75% वहन करने की ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की होती है। व्यवहार में इसका अर्थ है कि केंद्र और राज्यों के बीच खर्च का अनुपात लगभग 90:10 रहता है।

लेकिन प्रस्तावित विधेयक की धारा 22(2) में कहा गया है कि “केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच निधि साझा करने का अनुपात उत्तर-पूर्वी राज्यों, हिमालयी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर) के लिए 90:10 होगा, जबकि विधानमंडल वाले सभी अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए यह 60:40 होगा।” 

यह प्रावधान न केवल राज्यों पर भारी वित्तीय बोझ डालता है, बल्कि गरीब राज्यों और उन राज्यों पर भी असमान रूप से असर डालता है जहां से बड़ी संख्या में लोग रोज़गार के लिए पलायन करते हैं और जिन्हें ग्रामीण रोज़गार की सबसे अधिक ज़रूरत है। बढ़े हुए वित्तीय बोझ के कारण राज्य सरकारें खर्च कम करने की नीति अपनाने पर मजबूर होंगी और मज़दूरों की काम की मांग को दर्ज ही नहीं करेंगी।

73वें संविधान संशोधन के अनुरूप, मनरेगा में कामों की योजना स्थानीय ज़रूरतों के आधार पर ग्राम सभाओं के माध्यम से बनाई जाती थी। लेकिन प्रस्तावित विधेयक की अनुसूची 1, खंड 6(4) इस व्यवस्था को पलट देती है।

इसमें कहा गया है कि “विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक, राज्यों, ज़िलों और पंचायती राज संस्थाओं को प्राथमिक अवसंरचना की कमियों की पहचान करने, कार्य डिज़ाइनों का मानकीकरण करने और यह सुनिश्चित करने के लिए मार्गदर्शन करेगा कि सार्वजनिक निवेश ग्राम पंचायत, ब्लॉक और ज़िला स्तर पर संतृप्ति परिणामों में मापनीय योगदान दे।” 

स्थानीय स्तर से योजना बनाने की प्रक्रिया को हटाकर एक पहले से तय, केंद्रीकृत ‘राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक’ पर आधारित प्राथमिकता प्रणाली लागू करना, 73वें संविधान संशोधन की भावना को कमजोर करता है।

 मज़दूर संगठनों ने बार-बार यह बताया है कि मनरेगा में डिजिटल उपस्थिति और आधार-आधारित भुगतान प्रणाली जैसी अपारदर्शी और मनमानी तकनीकों के कारण बड़े पैमाने पर मज़दूरों को काम और भुगतान से बाहर किया गया है।

इसके बावजूद,प्रस्तावित विधेयक ऊपर से थोपे गए, तकनीक-आधारित निगरानी ढांचे को लागू करना चाहता है, जिसमें मनरेगा मज़दूरों और कर्मचारियों के लिए बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण को अनिवार्य किया गया है, साथ ही भू-स्थानिक तकनीक और कार्यों की जियो-रेफरेंसिंग का प्रावधान किया गया है। बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण में गंभीर समस्याएँ हैं, खासकर कृषि और शारीरिक श्रम करने वाले मज़दूरों के लिए, जैसा कि कई अध्ययनों और ज़मीनी रिपोर्टों से स्पष्ट होता है।

मनरेगा के तहत कोई भी ग्रामीण निवासी साल के किसी भी समय काम की मांग कर सकता है और उसे काम मिलना चाहिए। लेकिन प्रस्तावित विधेयक की धारा 6(2) में कहा गया है कि “राज्य सरकारें वित्तीय वर्ष में कुल मिलाकर साठ दिनों की एक अवधि पहले से अधिसूचित करेंगी, जो बुवाई और कटाई के चरम कृषि मौसम को कवर करेगी, और इस अवधि के दौरान इस अधिनियम के अंतर्गत कोई कार्य नहीं किया जाएगा।”

इस प्रावधान के चलते काम की ज़रूरत रखने वाले और काम करने को तैयार मज़दूर—खासतौर पर महिला मज़दूर—अब क़ानूनी रूप से कम से कम दो महीनों तक काम से वंचित कर दिए जाएंगे।

यह विधेयक कोई सुधार नहीं है, बल्कि दशकों के निरंतर संघर्षों के माध्यम से मज़दूरों द्वारा हासिल किए गए लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों को पीछे धकेलने का प्रयास है। मनरेगा के तहत मिले वैधानिक अधिकार को हटाकर, एक केंद्र-नियंत्रित, बजट-सीमित और अत्यधिक निगरानी वाली योजना लाकर, केंद्र सरकार एक ऐतिहासिक अधिकार-आधारित क़ानून को कमजोर करना चाहती है और काम के अधिकार को एक विवेकाधीन राहत में बदलने का प्रयास कर रही है।

यह विधेयक संविधान की भावना का उल्लंघन करता है, 73वें संविधान संशोधन को कमजोर करता है, और सामाजिक व आर्थिक न्याय की मूल अवधारणा पर प्रहार करता है, क्योंकि यह शक्ति को मज़दूरों, ग्राम सभाओं और राज्यों से छीनकर केंद्र सरकार के हाथों में केंद्रित करता है।

नरेगा संघर्ष मोर्चा ने कहा है कि मोर्चा विधेयक को पूरी तरह अस्वीकार करता है और इसकी तत्काल वापसी की मांग करता है। मज़दूरों और उनके संगठनों की सहमति व भागीदारी के बिना मनरेगा को निरस्त करने या उसमें मूलभूत बदलाव करने का कोई भी प्रयास अस्वीकार्य है। हम सभी लोकतांत्रिक शक्तियों से आह्वान करते हैं कि वे इन एकतरफ़ा और प्रतिगामी प्रस्तावों का विरोध करें और लाखों ग्रामीण मज़दूरों की आजीविका सुरक्षा के आधारस्तंभ के रूप में मनरेगा की रक्षा करें।

Leave a Reply